विकास की आंधी में उजड़ते फलदार वृक्ष, गुम होती गौरैया
फलदार पेड़ों की कमी से बिगड़ रहा पारिस्थितिक संतुलन, “एक पेड़–एक प्रयास” से ही लौटेगी चहचहाहट
लखनऊ। शहरों की सुबह अब पहले जैसी नहीं रही। कभी आंगन, खिड़कियों और छतों पर चहकने वाली गौरैया आज धीरे-धीरे हमारी जिंदगी से गायब होती जा रही है। उसकी मधुर आवाज, जो कभी सुबह की पहचान हुआ करती थी, अब विरले ही सुनाई देती है। यह केवल एक पक्षी के विलुप्त होने की कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरणीय असंतुलन का स्पष्ट संकेत है। शेषज्ञों और पर्यावरण प्रेमियों के अनुसार गौरैया व अन्य पक्षियों के कम होने का सबसे बड़ा कारण फलदार वृक्षों की घटती संख्या है। पहले आम, अमरूद, जामुन, बेर और आंवला जैसे पेड़ हर मोहल्ले और गांव में आसानी से दिख जाते थे। ये पेड़ न केवल फल और छाया देते थे, बल्कि पक्षियों के लिए भोजन और सुरक्षित घोंसले का आधार भी होते थे।
लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, कंक्रीट के जंगल और बहुमंजिला इमारतों ने इन पेड़ों की जगह ले ली है। नई कॉलोनियों में सजावटी पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि फलदार वृक्षों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसका सीधा असर गौरैया, बुलबुल, मैना और तोते जैसे पक्षियों की संख्या पर पड़ा है। आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश में वर्ष 2000 के आसपास फलदार वृक्षों का क्षेत्रफल 9-10 लाख हेक्टेयर था, जो 2020 के बाद घटकर लगभग 7-8 लाख हेक्टेयर रह गया है। लखनऊ जैसे तेजी से विकसित होते शहर में यह गिरावट और भी स्पष्ट दिखती है। सड़क चौड़ीकरण, ओवरब्रिज और नई परियोजनाओं के चलते सैकड़ों फलदार पेड़ काटे जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाली पीढ़ी गौरैया को केवल किताबों में ही देख पाएगी। इसके समाधान के लिए हर घर, हर मोहल्ले और हर संस्था में कम से कम एक फलदार पेड़ लगाने की जरूरत है। साथ ही छतों और बालकनियों में भी छोटे पौधे लगाकर योगदान दिया जा सकता है। सरकारी स्तर पर भी वृक्षारोपण अभियानों में फलदार पेड़ों को प्राथमिकता देना जरूरी है। “एक छात्र–एक पेड़” जैसे अभियान इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का कर्तव्य है। जब फलदार पेड़ बढ़ेंगे, तभी गौरैया लौटेगी और प्रकृति फिर से मुस्कुराएगी।
